Sunday, 25 January 2015

मिडियेशन को चाहिये कार्यवाही के अधिकार

पिछले दिनों मिडियेशन सेन्टर केे समक्ष कानपुर निवासी इन्जिनियर दम्पत्ति तलाक  के प्रपत्रों पर हस्ताक्षर करने के पूर्व रोते दिखाई दिये। उस क्षण दोनो अलग हो रहे अपने जीवन साथी के साथ गुजरे पलों की मधुर स्म्रतियों में खो कर भावुक हो गये थे। हलाॅकि उनमें तलाक हो गया है और अब दोनों अपने अपने तरीके से अपना जीवन जीने के लिये स्वतंन्त्र हो गये है। तलाक के समय दोनो की आॅखो में बरबस रोके गये आॅसुओं ने वहां उपस्थित सभी को हतप्रभ किया। लग रहा था कि इन दोनों के बीच गलतफहमियों के कारण उत्पन्न संवादहीनता को यदि शुरूआत में ही किसी निकटतम सम्बन्धी ने सदभावपूर्ण हस्तक्षेप करके रोक दिया होता, बातचीत सामान्य हो जाती तो निश्चित रूप से तलाक बचाया जा सकता था। आज माता पिता खुद अपने किशोर से युवा हो रहे बच्चों के साथ नियमित संवाद के लिये समय नही निकाल पाते। बच्चों के साथ उनकी दोस्ती नही हो पाती इसलिये बच्चे खुलकर अपनी भावनात्मक जरूरते उनसे साझा नही करते। इस माहौल में पले बढे बच्चे अपने दाम्पत्य जीवन की दिन प्रतिदिन की उलझनों को अपने निकटतम सम्बन्धियो से छिपाते है। उलझनो का समाधान स्वंय खोजते है और इसी कारण पति पत्नी के बीच साधारण मन मुटाव की स्थिति में भी माता पिता या अन्य किसी निकटतम सम्बन्धी को वे अपने बीच सामान्जस्य बिठाने की पहल करने का अवसर नही देते और फिर सामन्जस्य बिठाने की चाहत के बावजूद “पहले पहल कौन करे” की कश्मकश के बीच अपने अपने अहं मे चाहते हुये भी दोनो आपस के मनमुटाव या गलतफहमियों को खुद दूर नही कर पाते और तलाक उनके दरवाजे पर दस्तक देने लगता है।

तलाक की बढती घटनाओं के लिये युवा दम्पत्तियों के साथ उनके माता पिता या अन्य निकटतम सम्बन्धियो की निरन्तर संवादहीनता एक बडा कारण है। इस सामाजिक कमी को दूर करने और परस्पर बातचीत के द्वारा आपसी सौहार्द और आत्मीयता बनाने, बढाने के लिये मिडियेशन सेन्टर का गठन किया गया है। वैवाहिक विवादो पर कोई अन्तिम निर्णय लेने के पूर्व दम्पत्तियों को सुलह समझौते के लिये मिडियेशन सेन्टर के समक्ष भेजे जाने का नियम कडाई से लागू है।  आपराधिक धाराओं में मुकदमे पंजीकृत करने के लिये दी गई अर्जियों पर भी अब थाना स्तर पर कोई कार्यवाही किये जाने के पूर्व मामलो को पारस्परिक बातचीत के लिये मिडियेशन सेन्टर भेजा जाने लगा है परन्तु कोई विधिपूर्ण शक्ति न होने के कारण विवादो को सुलझाने मे मिडियेशन सेन्टर की भूमिका निर्णायक नही हो पा रही है। मिडियेशन किसी सकारात्मक परिणाम तक पहॅुचने के लिये नही बल्कि केवल औपचारिकता के लिये किया और कराया जाने लगा है। एक कम्पनी सेकेट्री पत्नी की शिकायत पर उसके चार्टड एकाउन्टेन्ट पति पर आपराधिक धाराओ में मुकदमा पंजीकृत हो जाने के बाद पति के अनुरोध पर मामला मिडियेशन सेन्टर के समक्ष संदर्भित किया गया। पति को आपाधिक धाराओं में अपनी गिरफ्तारी का भय था इसलिये उसने पुलिस स्टेशन पर बातचीत के द्वारा मामला सुलझ जाने की आशा जताई। सुनवाई के दौरान पति ने पत्नी और अपनी तीन वर्षीय बेटी को अपने साथ ले जाने की इच्छा जताई। पत्नी तैयार हो गयी। लेेकिन कभी किराये पर घर न मिल पाने और कभी कोई दूसरा बहाना बताकर पति पत्नी को अपने साथ नही ले गया। पति का आचरण शुरूआत से ही आपत्तिजनक था। पत्नी के लिये अपमानजनक भी। पति के द्वारा जानबूझ कर असहयोग किये जाने के कारण मिडियेशन असफल हुआ परन्तु भविष्य में न्यायालय के समक्ष चलने वाली किसी  कार्यवाही में पति के इस आचरण पर उसके विरूद्ध किसी कार्यवाही का प्रावधान न होने के कारण लोग मिडियेशन सेन्टर को गम्भीरता से नही लेते और उसकी कार्यवाही को भी लम्बित बनाये रखने का प्रयास करते है।

24 वर्षीय बेटी के चिकित्सक पिता ने पुत्र पैदा न होने के कारण अपनी पत्नी से सम्बन्ध विच्छेद कर लिया है। पत्नी और अपनी बेटियो को भरण पोषण के लिये भगवान भरोसे छोड दिया है। न्यायालय ने खुद विवाद को सुलझाने के लिये मिडियेशन सेन्टर के समक्ष भेज दिया है। मिडियेशन सेन्टर द्वारा कई बार सूचना भेजे जाने के बावजूद पति उपस्थित नही हो रहा है। पत्नी प्रत्येक तिथि पर समझौते की आस में उपस्थित रहती है और निराश होकर वापस चली जाती है। उसके सामने दोनो बेटियो के विवाह और खुद अपने जीवन यापन की चिन्ता है लेकिन इस साझी चिन्ता के प्रति पति एकदम उदासीन है। इस मामले मे चिकित्सक पति का आचरण शुरूआत से ही आपराधिक है और पत्नी के लिये क्रूरता की परिधि में आता है। मिडियेशन सेन्टर में मिडियेटर खुद पति के आचरण से संतुष्ट नही है परन्तु शक्ति विहीन होने के कारण मिडियेटर पति को अपने दाम्पत्य कर्तव्यो का पालन करने के लिये विवश नही कर सकते। केवल रिपोर्ट भेज सकेगें कि मिडियेशन सफल नही हुआ। इसी प्रकार एक इन्जीनियर पत्नी भी आपसी सुलह समझौतेे के लिये मिडियेशन सेन्टर में अपने पति का इन्तजार करती रहती है। डाक्टर पति को मिडियेटर ने स्वंय उसके मोबाइल पर उससे बातचीत की। उसकी सहमति से अगली तिथि नियत की परन्तु अगली तिथि पर भी डाक्टर नही आया। इन दोनो के दाम्पत्य साहचर्य से एक बेटे का जन्म भी हो गया है और पति अपनी पत्नी और बेटे के भरण पोषण की कोई चिन्ता नही करता। पत्नी अकेले बेटे को पाल रही है और अकेले पन का शिकार है। उसे अपने भविष्य को लेकर निराश होने लगी है। डाक्टर पति जानबूझ कर मिडियेशन सेन्टर और अपनी पत्नी की उपेक्षा कर रहा है। मिडियेटर सबकुछ समझते हुये भी डाक्टर पति के विरूद्ध कोई कार्यवाही न कर पाने में अपने आपको असहाय पाते है।

सर्वोच्च न्यायालय के मिडियेशन सेन्टर के समक्ष एम.बी.ए. दम्पत्ति के वैवाहिक विवाद मे कई दिनों की लम्बी बातचीत और मिलने जुलने के समुचित अवसर मिलने के बाद आपसी समझौता हो गया। समझौते के तहत पत्नी पति के साथ दाम्पत्य सम्बन्धो के निर्वहन के लिये कानपुर आ गयी। कई महीने पति के साथ रही परन्तु इस दौरान पति जानबूझकर पत्नी को अपमानित करने के लिये सहवास के अवसरो को नजरन्दाज करता रहा। एक भी दिन पत्नी के प्रति आत्मीय नही हुआ और सदैव उसे उत्पीडित करता रहा। मजबूरन पत्नी मायके लौट गई। पति के माता पिता दोनो की गलतफहमियों को दूर कराने के लिये तैयार नही है। पत्नी के माता पिता का पति सम्मान नही करता इसलिये वे अपने आपको असहाय पाते है। मिडियेशन सेन्टर भी इस प्रकार के विवादो में खुद को असहाय पाता है। उसके पास दोषी व्यक्ति को चिन्हित करके उसके विरूद्ध कार्यवाही करने की अनुशंशा करने का भी अधिकार नही है।

वैवाहिक विवादो को सुलझाने में बुआ, मौसी, चाची की भूमिका महत्वपूर्ण हुआ करती थी। वे एक दूसरे के स्वभाव  और उसकी पारिवारिक पृष्ठिभूमि से सुपरिचित रहती थी इसलिये उन्हे विवाह के बाद दोनो परिवारो के बीच सामन्जस्य बिठाने मे आने वाली कठिनाइयो का ज्ञान होता था और वे एक दूसरे पर नैतिक दबाव बनाकर विवाद सुलझा दिया करती थी। आज युवा दम्पत्तियो पर परिवार या समाज का नैतिक प्रभाव समाप्त हो गया है। किसी को मनाने या किसी की बात मानने का माहौल नही है इसलिये मिडियेशन सेन्टर की भूमिका बढ गयी है और उसे ज्यादा प्रभावी किये जाने की जरूरत है।

मिडियेशन सेन्टर के समक्ष आपसी बातचीत के दौरान दोषी पक्षकार चिन्हित हो जाता है। स्पष्ट हो जाता है कि दोषी कौन है? इसलिये मिडियेटर को अपने समक्ष संदर्भित विवाद पर एक विस्तृत रिपोर्ट भेजने का अधिकार दिया जाना चाहिये। रिपोर्ट मे सुनवाई के लिये नियत तिथियो की संख्या, उन तिथियों पर पक्षकारों की उपस्थिति, आपसी सुलह समझौते मे पक्षकारो की व्यक्तिगत रूचि अरूचि और उनके द्वारा किये गये सहयोग या असहयोग का स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिये ताकि न्यायालय को वैवाहिक विवाद का न्यायपूर्ण समाधान करने मे सहायता प्राप्त हो सके और कोई पक्षकार मिडियेशन सेन्टर का अनुचित सहारा लेकर दूसरे पक्षकार को प्रताडित करने में सफल न हो सके।


Sunday, 18 January 2015

पश्चिम उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट की बेन्च लोगो की जरूरत है

पिछले कई वर्षो से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट की बेन्च स्थापित करने के लिये वहाॅ के अधिवक्ता आन्दोलनरत है। उनकी माॅग को दृष्टिगत रखकर केन्द्रीय मन्त्री श्री रविशंकर प्रसाद ने विधि मन्त्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री डा0 डी.वाई.चन्द्रचूड को पत्र लिखकर बेन्च की स्थापना बाबत उच्च न्यायालय की राय माॅगी थी। इसके पूर्व मनमोहन सरकार के विधि मन्त्री कपिल सिब्बल ने भी इसी आशय का पत्र मुख्य न्यायाधीश को लिखा था परन्तु इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बेन्च की स्थापना के लिये राज्य सरकार की ओर से कोई प्रस्ताव न होने का बहाना बताकर अपनी राय देने से इन्कार कर दिया है जो किसी भी दशा में न्याय संगत नही है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट की बेन्च की स्थापना का इलाहाबाद के वकील पुरजोर विरोध कर रहे है। उनका विरोध आम जनता के व्यापक हितो और सस्ता,सहज और त्वरित न्याय पाने के अधिकार के प्रतिकूल है। उनका सम्पूर्ण विरोध निजी कारणो से आर्थिक स्वार्थ पर आधारित है। वे भूल जाते है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आम लोगो को अपने मुकदमो की पैरवी के लिये इलाहाबाद आने में कितनी असुविधाओं का सामना करना पडता है। 
यह सच है कि उत्तरी कर्नाटक के जिलो की बंगलूरू स्थित हाई कोर्ट से दूरी के आधार पर एक अन्य पीठ गठित करने के लिये दाखिल याचिका को सर्वाेच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया है। अपने इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा था कि कोई वादी अपने घर के पास हाई कोर्ट होने के मौलिक अधिकार का दावा नही कर सकता। दूरी एक पहलू हो सकती है लेकिन सिर्फ दूरी के आधार पर फैसला नही किया जा सकता। यह फैसला अपनी जगह है उसके गुणदोष पर टिप्पणी किये बिना कहा जा सकता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला सुसंगत नही है और न इस आधार पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट की बेन्च बनाने से इन्कार किया जा सकता है क्योकि उत्तर प्रदेश में पहले से लखनऊ में उच्च न्यायालय की एक बेन्च है और इन दोनो बेन्चो के लिये एक ही मुख्य न्यायाधीश और एक ही महाधिवक्ता होने के कारण कामकाज की गुणवक्ता पर किसी प्रकार का कोई दुष्प्रभाव नही पड रहा है। सभी काम सुचारू रूप से जारी है और कहीं कोई विवाद भी नही है।
इलाबाद उच्च न्यायालय द्वारा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खण्ड पीठ की स्थापना के लिये अपनी राय देने से इन्कार किये जाने पर इलाबाद के अधिवक्ताओं ने विजय जलूस निकाला और अपनी कई दिन पुरानी हडताल को भी समाप्त कर दिया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने निर्णय लिया है कि “एक प्रदेश एक हाई कोर्ट” का आन्दोलन जारी रहेगा और राजनेताओ और नागरिको से सम्पर्क बनाये रखकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिवक्ताओं की माॅग के विरोध में माहौल बनाये रखा जायेगा।
राजीव गाॅधी के कार्यकाल में केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों की संख्या को दृष्टिगत रखकर केन्द्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण की बेन्च कानपुर नगर में बनाये जाने का प्रस्ताव किया गया था और नेटिफिकेशन के अतिरिक्त अन्य सभी औपचारिकतायें पूरी कर ली गयी थी परन्तु इलाहाबाद के अधिवक्ताओं के विरोध और वहाॅं के तत्कालीन सांसद श्री अमिताभ बच्चन के प्रभाव-दबाव में तत्कालीन सरकार ने केन्द्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकण की बेन्च इलाहाबाद में ही स्थापित कर दी थी जिसका कानपुर के अधिवक्ताओं ने पुरजोर विरोध किया और कई वर्षो तक लगातार विरोध स्वरूप प्रत्येक शनिवार को न्यायिक कार्य का बहिस्कार करते रहे है। सभी जानते है कि केन्द्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण के समक्ष सबसे ज्यादा मुकदमें कानपुर नगर में उत्पन्न विवाद से सम्बन्धित मुकदमें दाखिल होते है। कर्मचारियों को न्याय पाने के लिये अधिक धन और समय व्यय करना पडता है। आम कर्मचारियों के हित में न्यायाधिकरण को कानपुर स्थापित किया जाना जरूरी था परन्तु राजनैतिक दवाब ने कानपुर को उसके विधिपूर्ण अवसर से वंचित कर दिया।
सभी जानते है कि इलाबाद के अधिवक्ताओं की जिद के कारण बरेली, आदि जिलों के लोगों को न्याय पाने के लिये लखनऊ होकर इलाहाबाद जाना पडता है। कोई औचित्य इन लोगो को इलाहाबाद बेन्च के क्षेत्राधिकार के साथ सम्बद्ध रखने का कोई औचित्य नही है। इससे आम लोगो को परेशानी होती है और आर्थिक क्षति का शिकार होना पडता ह।
आम लोगो को सस्ता, सहज और त्वरित न्याय उपलब्ध कराना केन्द्र और राज्य दोनों सरकारो का संवैधानिक दायित्व है और इस दायित्व की पूर्ति न्याय क्षेत्र में इलाहाबाद के अधिवक्ताओं के एकाधिकार को सीमित करके ही की जा सकती है। मेरठ, गाजियाबाद, बुलन्दशहर, सहारनपुर, ललितपुर, झांसी, कुशीनगर, देवरिया, के आम वादकारियों को इलाहाबाद आने में किन कठिनाईओं और आर्थिक समस्याओं का सामना करना पडता है के मुद्दे पर कोई सरकार, इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोशियेशन या उत्तर प्रदेश बार काउन्सिल विचार करने या उस पर पारसपरिक सहमति बनाने के लिये तैयार नही है। सभी इस मुददे पर मौन हैं और उन सब को मालूम है कि अतिशीध्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक अतिरिक्त बेन्च की स्थापना को लेकर कोई सकारात्मक निर्णय नही लिया गया तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिवक्ताओं और इलाहाबाद के अधिवक्ताओ के बीच वैमनस्यता स्थायी हो जावेगी जो अन्तः सम्पूर्ण राष्ट्र और समाज के लिये हितकर नही है।
इलाहाबाद में उच्च न्यायालय, केन्द्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण और आयकर अपीलीय अधिकरण स्थापित होने के कारण जनपद न्यायालयों के कई प्रतिभाशाली युवा अधिवक्ता इन न्यायालयों में वकालत करने के अवसर से वंचित हो जाते है। केन्द्र सरकार ने केन्द्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण की स्थापना कानपुर नगर में की है और यह अदालत आम कर्मचारियों के व्यापक हितों को दृष्टिगत रखकर उनके मुकदमों की सुनवाई कानपुर से बाहर जाकर उनके जिलों में करती है। इस अदालत के लिये कानपुर से बाहर गैर जनपदों में सुनवाई करना आम बात है। सरकार की तरफ से कानपुर के अधिवक्ताओं को आश्वासन दिया गया था कि केन्द्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण की सर्किट बेन्च बनायी जायेगी जो इलाहाबाद से बाहर जाकर केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों के सेवा सम्बन्धी विवादो का निर्णय करगी परन्तु आज तक इस दशा में कोई सार्थक पहल नही की गयी है। जिसके कारण कानपुर के लोग अपने को ठगा सा महसूस करते है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उच्च न्यायालय की एक अतिरिक्त बेन्च बनाने में यदि वास्तव में कोई संवैधानिक बाधा है तो उच्च न्यायालय या सरकार की ओर से सर्वजनिक स्पष्टीकरण दिया जाना चाहिये और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिवक्ताओ को विश्वास में लेकर इलाहाबाद में बेन्च होने के कारण उनकी न्यायपूर्ण कठिनाईओं के समाधान का विकल्प तलाशा जाना चाहिये। उच्च न्यायालय की अतिरिक्त बेन्च की माॅग को लेकर प्रदेश के अलग अलग क्षेत्रों के अधिवक्ताओं के मध्य बढती वैमनश्यता को खतम कराया जाना केन्द्र और राज्य दोनों सरकारों  की प्राथमिकता होना चाहिये। केन्द्र और राज्य सरकार को इस म ुददे पर एक दूसरे पर दोषारोपण करने के अवसर खोजने के बजाए सर्वसम्मत राय बनाने की दिशा में सकारात्मक पहल करनी चाहिये। केन्द्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण की तर्ज पर यदि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सप्ताह में एक दिन इलाहाबाद के बाहर जाकर सुदूर क्षेत्रों मेें मुकदमों की सुनवाई करे तो आम लोगों को राहत मिलेगी और सस्ता, सहज और त्वरित न्याय पाने का सपना भी साकार हो सकेगा। 

Monday, 12 January 2015

अदालतों में सरकार नही माॅगेगी स्थगन

मोदी सरकार के कैबिनेट सचिव ने अपने अधीनस्थ सभी विभागों को विभिन्न न्यायालयों के समक्ष सरकार की ओर से या सरकार के विरूद्ध दाखिल मुकदमों में सरकार के हितो का प्रभावी तरीके से बचाव करने और विशेष परिस्थितियों में अपवाद स्वरूप ही स्थगन प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करने का निर्देश जारी किया है। इन नये निर्देशों में विभागो के सचिवों को हिदायत दी गयी है कि वे खुद अदालती मामलों की निगरानी करें और एस.एम.एस आदि इलेक्ट्रानिक साधनों के द्वारा शासकीय अधिवक्ताओं के साथ नियमित सम्पर्क बनाये रखें। सरकार का मानना है कि स्थगन प्रार्थना पत्रों के कारण समय पर लिखित कथन या आपत्ति प्रस्तुत करने में सरकार की क्षमता और योग्यता पर बेवजह सवाल खडे होते है जो किसी भी दशा में हितकर नही है। महत्वपूर्ण मामलों में जहाॅ पूर्व सरकार की ओर से शपथ पत्र दिये गये है, उनकी समीक्षा करने और उनमें नई परिस्थितियों और नई सरकार के विचारों के अनुरूप आवश्यक बदलाव किये जाने का भी निर्देश जारी किया गया है। 
पूर्व केन्द्रीय विधि मन्त्री श्री वीरप्पा मोइली ने अपने कार्यकाल के दौरान वर्ष 2010 में नेशनल लिटिगेशन पाॅलिसी जारी की थी और उसमें भी इसी प्रकार के निर्देश जारी किये गये थे परन्तु विभागो के स्तर पर अदालती कार्यवाही की पैरवी में किसी प्रकार का कोई बदलाव नही किया जा सका। परिस्थितियां ज्यों की त्यों बनी हुयी है। साधारण मामलों में भी अदालत के हस्ताक्षेप के बिना किसी नियम को लागू करने में सरकारी अधिकारियों के अनिर्णय के कारण सरकार अनावश्यक मुकदमें बाजी को आमन्त्रित करती है। विधि आयोग ने अपनी 145वीं रिपोर्ट में साधारण विवादों पर सरकार की ओर से की जा रही मुकदमें बाजी को रोकने की अनुसंशा की है। सुखदेव सिंह बनाम भगत राम सरदार सिंह रघुवंशी (1975-1-एस.सी.सी-421) में सर्वेच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने भी साधारण मामलों में भी सरकार द्वारा की जा रही मुकदमें बाजी पर चिन्ता जतायी थी।
न्यायालयों के समक्ष लम्बित मुकदमों के अम्बार को कम करने के लिये विभिन्न स्तरो पर स्पेसिफिक विवादो के त्वरित निस्तारणो ंके लिये न्यायाधिकरणो का गठन किया गया है और अपेक्षा की गयी थी कि सरकार न्यायाधिकरणों के फैसलो के विरूद्ध विशेष परिस्थितियों में अपवाद स्वरूप ही अपील दाखिल करेगी। नई लिटिगेशन पाॅलिसी में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि सेवा सम्बन्धी विवादों में केन्द्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण द्वारा पारित आदेशो के विरूद्ध उन्हे अपास्त कराने के लिये सरकार अपील नही करेगी। अपील केवल उसी दशा में की जायेगी जब न्यायाधिकरण का फैसला सेवा शर्तो के प्रतिकूल हो और उससे नीतिगत विषयों पर दुष्प्रभाव की गम्भीर आशंका हो परन्तु अनुभव बताता है कि विभागीय स्तर पर प्रत्येक फैसले के विरूद्ध अपील दाखिल करना अधिकारियों का प्रिय सगल है जबकि सर्वेच्च न्यायालय ने हरियाणा डेयरी डेवलपमेंट कोआॅपरेटिव फेडेरेशन लिमिडेट बनाम जगदीश लाल (2014-1-सुप्रीम कोर्ट केसेज- एल एण्ड एस- 487) में पारित अपने निर्णय के द्वारा रूपया 8724/- के भुगतान के विवाद में सरकार की तरफ से सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष याचिका दाखिल करने पर अप्रसन्नता व्यक्त की और मुकदमें के सम्पर्ण व्यय की कटौती प्रबन्ध निदेशक के वेतन से करने का निर्देश जारी किया है। इस सबके बावजूद सरकारी अधिकारियों के रवैये में कोई परिवर्तन नही आया है।
सरकार आम लोगो को अपने आपसी विवाद सुलह समझौता के द्वारा सुलझाने की सलाह देती है परन्तु अपने मामलों में वह खुद इस नियम का पालन नही करती। सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत 90 दिन के अन्दर लिखित कथन दाखिल करने की अनिवार्यता लागू हो जाने के बावजूद सरकार किसी एक मामले में भी नियत अवधि के अन्दर लिखित कथन दाखिल नही करती और महीनों किसी न किसी बहाने सुनवायी स्थगित कराती रहती है। बताया जाता है कि मुख्यालय या उच्चाधिकारियों का अनुमोदन लिये बिना स्थानीय अधिकारी अदालतो के समक्ष विभागीय पक्ष प्रस्तुत नही कर सकते और अनुमोदन कभी समय से प्राप्त नही होता उसमें अनावश्यक देरी होती है। 
सरकार ने लिखित कथन आदि दाखिल करने में विलम्ब को कम करने और निर्धारित तिथि पर नियत कार्यवाही सुनिश्चित कराने के लिये नेशनल लिटिगेशन पाॅलिसी में नोडल अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान किया है। नोडल अधिकारी दिन प्रति दिन की अदालती कार्यवाही पर नजर रखेगें और सुनिश्चित करायेगे कि विभागीय स्तर पर मुकदमों की पैरवी में किसी भी प्रकार की सिथिलता न होने पाये। नोडल अधिकारी विभाग और शासकीय अधिवक्ता के मध्य सेतु का काम करेगें। उसका दायित्व है कि वह शासकीय अधिवक्ता की माॅग और अपेक्षा पर सभी सुसंगत कागजात उपलब्ध कराये और अदालत के समक्ष प्रस्तुत की जाने वाली प्लीडिंग्स को नियत तिथि के पूर्व तैयार कराये ताकि नियत तिथि की क्रत कार्यवाही में सरकार को स्थगन प्रार्थना पत्र न प्रस्तुत करना पडें। मुकदमों की सुनवाई के दौरान प्रायः सरकार के विरूद्ध न्यायालय द्वारा कास्ट अधिरोपित की जाती है। इस प्रकार के मुकदमों की नियमित समीक्षा की जाये और कास्ट के लिये जिम्मेेदारी चिन्हित करके दोषी अधिकारी या अधिवक्ता के विरूद्ध कार्यवाही सुनिश्चित करायी जाये।
सरकार ने लिटिगेशन पाॅलिसी के तहत नोडल अधिकारियों को ज्यादा जिम्मेदारी दी है। उनसे अपेक्षा की गयी है कि वे सभी पक्षो के साथ सामन्जस्य बिठा कर मुकदमों की सुनवाई में विभागीय कमियों के कारण किसी प्रकार का अवरोध उत्पन्न नही होने देगें। वे मुकदमोे की प्रगति को माॅनीटर करेगे और उन मुकदमों पर विशेष ध्यान देगें जिनमें प्रायः किसी न किसी पक्षकार द्वारा स्थगन प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया जाता है। नोडल अधिकारी की जिम्मेदारी है कि वह विभागाध्यक्षों को स्थगन प्रार्थना पत्र के कारण से अवगत कराये और यदि कोई शासकीय अधिवक्ता विभागीय कमियों का बहाना बनाकर अपने कारणो से स्थगन प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करता है तो उसकी सूचना सम्बन्धित अधिकारियों को दे ताकि दोषी अधिवक्ता के विरूद्ध कार्यवाही सुनिश्चित की जा सके। सरकार ने स्थगन के प्रश्न को गम्भीरता से लिया है और स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई शासकीय अधिवक्ता नियत तिथि पर अपेक्षित कार्यवाही सुनिश्चित नही कराता तो उसे उसके पद से हटा दिया जायेगा।
सरकार ने अपनी तरफ से दाखिल प्लीडिंग्स और काउन्टर्स की ड्राफ्टिंग की भाषा एवम शैली में भी सुधार की जरूरत बतायी है। सरकार ने कहा है कि वाद पत्र या याचिका तैयार करते समय ध्यान रखा जाये कि कोई बिन्दु दोहराया न जाये और सभी सुसंगत तथ्यों को बिन्दु वार प्रस्तुत किया जाये। सभी सुसंगत कागजातों की प्रति वाद पत्र या लिखित कथन के साथ प्रस्तुत की जाये ताकि मुकदमों के निस्तारण में अनावश्यक विलम्ब न हो। प्रायः देखा जाता है कि अन्तिम सुनुवाई के समय अदालत की लताड के बाद किसी सुसंगत कागजात को दाखिल न किये जाने की जानकारी प्राप्त होती है और उसके कारण सरकार को अपमानित होना पडता है।
नई लिटिगेशन पाॅलिसी में बिलम्ब से दाखिल की गयी अपीलो पर भी चिन्ता जताई गयी है। सरकार ने कहा है कि बिलम्ब माॅफ न हो पाने के कारण कई बार एकदम सही मामलों में भी सरकार के विरूद्ध निर्णय पारित हो जाते है। विलम्ब से अपीलें कई बार प्रक्रियागत कमियों के कारण और कई बार जानबूझ कर किसी को अनुचित लाभ पहुंचाने के दुराशय से दाखिल की जाती हैं इसलिये विभागाध्यक्षो को स्वंय सजग रह कर सुनिश्चित कराना होगा कि शासकीय अधिवक्ता को समस्त सुसंगत कागजात नियत अवधि के पूर्व उपलब्ध करा दिये जाये और यदि फिर भी अपील दाखिल करने में बिलम्ब होता है तो उसके लिये जिम्मेदारी चिन्हित करके विधि मन्त्रालय को सूचित किया जाये।
सर्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों के बीच भी लिटिगेशन आम बात हो गयी है। कोई न कोई प्रतिष्ठान अपने किसी उच्चाधिकारी के अहम की संतुष्टि के लिये किसी दूसरे प्रतिष्ठान के साथ मुकदमें बाजी में व्यस्त है। सरकार ने इस प्रकार की मुकदमेंबाजी को तत्काल प्रभाव से रोकने का निर्णय लिया है। इस प्रकार के आन्तरिक विवादों में कोई मुकदमा दाखिल करने के पूर्व प्रबन्घ निदेशक जैसे उच्चाधिकारी की अनुमति लेना अनिवार्य बना दिया गया है। प्रयास किया जायेगा कि उच्चस्तरीय विचार विर्मश करके उत्पन्न विवाद का समाधान निकाला जाये और यदि आपसी बातचीत के द्वारा विवाद निपट नही पाता तब भी कोई प्रतिष्ठान न्यायालय की शरण नही लेगा बल्कि आरबीट्रेशन एण्ड कन्शिलियेशन एक्ट या सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 89 का सहारा लेकर विवाद का निस्तारण करायेगा।
सरकार अपने विरूद्ध या अपनी ओर से दाखिल किये गये मुकदमों की पेन्डेन्सी को कम करके  15 वर्ष से 3 वर्ष की अवधि में लाना चाहती है परन्तु उसके प्रयासो को देखकर लगता है कि उसके द्वारा घोषित नीति अभी तक सदिच्छा से आगे नही बढ सकी है। जमीनी स्तर पर विभागीय अधिकारी कर्मचारियों की कमी का उलाहना देते रहते है और इसी कारण नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की दिशा में अभी तक कोई सार्थक प्रयास नही किये जा सके है और न शासकीय अधिवक्ताओं के साथ विचार विमर्श की किसी नियमित प्रक्रिया का कोई तन्त्र विकसित किया गया है। भारतीय वायु सेना ने अपने स्तर पर शुरूआत से ही अपने मुकदमो की पैरवी के लिये लीगल पृष्ठभूमि के कर्मचारियों की नियुक्ति कर रखी है और उसका उन्हे लाभ मिलता है। भारतीय वायु सेना के मुकदमों में विभागीय कारणों से स्थगन की नौबत नही आती। 

Monday, 29 December 2014

सम्पत्ति के अधिकार की तरह है पेन्शन

सर्वोच्च न्यायालय ने स्टेट आॅफ झारखण्ड एण्ड अदर्स बनाम जितेन्द्र कुमार श्रीवास्तव एण्ड अदर्स (2014-2-सुप्रीम कोर्ट केसेज-एल एण्ड एस-570) में प्रतिपादित किया है कि किसी कर्मचारी को पेन्शन एवम ग्रेच्युटी उसके सेवायोजक की कृपा पर नही बल्कि सम्पत्ति के अधिकार के तहत प्राप्त होती है और किसी कर्मचारी को पेन्शन एवम ग्रेच्युटी के अधिकार से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 300 ए का उल्लघंन है। 
सुस्थापित और सर्वस्वीकृत है कि पेन्शन एवम ग्रेच्युटी किसी सेवायोजक की कृपा का प्रतिफल नही है। अपनी मेहनत निष्ठा और ईमानदारी से लम्बे समय तक सेवा करने वाले कर्मचारियों को इनके लाभ मिलते है। ये लाभ मेहनत से अर्जित लाभ है जो सम्पत्ति के अधिकार की तरह कर्मचारियों के सेवा हितलाभो के साथ निहित होते है और विधिक प्रक्रिया का अनुपालन किये बिना कोई सेवायोजक किसी कर्मचारी को इनके लाभो से वंचित नही कर सकता है। 
झारखण्ड सरकार ने अपने एक कर्मचारी को उसके विरूद्ध भारतीय दण्ड संहिता एवम भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत पंजीकृत आपराधिक मुकदमों और विभागीय स्तर पर अनुशासनात्मक कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान सेवानिवृत्ति पर उसकी पंेशन अवकाश नकदीकरण एवम ग्रेच्युटी का भुगतान नही किया। राज्य सरकार के इस निर्णय के विरूद्ध कर्मचारी ने उच्च न्यायालय के समक्ष याचिका दाखिल की जिस पर उच्च न्यायालय ने आदेश पारित करके कर्मचारी को राज्य सरकार के समक्ष प्रतिवेदन दाखिल करने का निर्देश दिया। उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश के अनुपालन मे कर्मचारी ने राज्य सरकार के समक्ष प्रतिवेदन प्रस्तुत करके पेन्शन, ग्रेच्युटी एवम अवकाश नगदीकरण दिये जाने की माॅग की। परन्तु राज्य सरकार ने कर्मचारी के प्रतिवेदन को खारिज कर दिया। राज्य सरकार के इस आदेश के विरूद्ध कर्मचारी ने पुनः उच्च न्यायालय के समक्ष याचिका दाखिल की जो खारिज हो गयी। हाई कोर्ट के इस आदेश के विरूद्ध उसे अपास्त कराने के लिये कर्मचारी ने डिवीजन बेन्च के समक्ष अपील दाखिल की जिसे उच्च न्यायालय ने दूधनाथ पाण्डेय बनाम स्टेट आॅफ झारखण्ड (2007-2-बी.एल.जे.आर-2847) में फुल बेन्च द्वारा पारित निर्णय को दृष्टिगत रखकर स्वीकार कर लिया और राज्य सरकार को पेन्शन ग्रेच्युटी एवम अवकाश नगदीकरण का भुगतान करने के लिये आदेशित किया।
राज्य सरकार ने अपने पेन्शन नियमों में आपराधिक मुकदमा या अनुशासनात्मक कार्यवाही के लम्बित रहने के दौरान सेवा हितलाभों के भुगतान का कोई प्रावधान न होने के बावजूद केवल वित्त विभाग द्वारा जारी शासनादेश को आधार बनाकर पेन्शन एवम ग्रेच्युटी का भुगतान रोका था। राज्य सरकार ने संतराम शर्मा बनाम स्टेट आॅफ राजस्थान (ए.आई.आर-1967-सुप्रीम कोर्ट-1910) में पारित निर्णय का सहारा लेकर सर्वेच्च न्यायालय के समक्ष डिवीजन बेन्च द्वारा पारित निर्णय के विरूद्ध उसे अपास्त कराने के लिये अपील दाखिल की और दलील दी कि यदि किसी विषय विशेष के सम्बन्ध में कोई नियम विद्यमान नही है तो राज्य सरकार को अधिकार है कि वह प्रशासनिक आदेश जारी करके इस कमी को पूरा कर ले। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की इस दलील को स्वीकार नही किया और स्पष्ट किया कि संतराम शर्मा वाले मामले में न्यायालय के समक्ष प्रशासनिक आदेश के तहत पेन्शन एवम ग्रेच्युटी को रोके जाने का विवाद प्रश्नगत नही था बल्कि उसमें प्रशासनिक आदेश की विधिक हैसियत का विवाद प्रश्नगत था इसलिये संतराम शर्मा के मामले में प्रतिपादित विधि सेवा हितलाभों के विवाद में लागू नही हो सकती।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा था कि यह सच है कि सेलेक्शन ग्रेड पदों पर जूनियर और सीनियर ग्रेड अधिकारियों की पदोन्नति का नियमो में कोई प्रावधान नही है। इसका यह अर्थ नही है कि जब तक सरकार इस आशय के नियम नही बनाती है तब तक सरकार पदोेन्नति के लिये कोई शासनादेश जारी नही किये जा सकते। इन स्थितियों में प्रशासनिक सहूलियतों के लिये राज्य सरकार को प्रशासनिक निर्देश जारी करने का अधिकार है परन्तु राज्य सरकार को प्रशासनिक आदेश के द्वारा किसी नियम को प्रतिस्थापित करने का अधिकार प्राप्त नही है। 
सर्वोच्च न्यायालय ने डी.एस नकारा बनाम यूनियन आॅफ इण्डिया (1983-1-एस.सी.सी-305) में पेंशन क्यो दी जाती है? क्या सरकार या सेवायोजक अपने कर्मचारी को पंेशन देने के लिये बाध्य है? पेंशन क्या है? पेंशन का उद्देश्य क्या है? पंेशन देने में क्या जनहित है? आदि प्रश्नों का उत्तर देते हुये संवैधानिक पीठ द्वारा देवकी नन्दन प्रसाद बनाम स्टेट आॅफ बिहार (1971-2-एस.सी.सी-330) एवम स्टेट आॅफ पंजाब बनाम इकबाल सिंह (1976-2-एस.सी.सी-1) को उदधृत करते हुये स्पष्ट किया है कि पंेशन सेवायोजको की कृपा या उनकी सदिच्छा का प्रतिफल नही है बल्कि इसे पाना कर्मचारी का अधिकार है जो नियमों द्वारा शासित होता है। जो कर्मचारी इन नियमों की परिधि मे आता है उसे अधिकार स्वरूप पंेशन दिये जाने का प्रावधान है। इसी निर्णय में प्रतिपादित किया गया है कि पेंशन सम्पत्ति की तरह का अधिकार है जिससे कर्मचारी को विधिक प्रक्रिया का अनुपालन किये बिना वंचित नही किया जा सकता। सर्वाेच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि पेंशन के अधिकार में किसी तरह का हस्तक्षेप संविधान के अनुच्छेद19(1)(एफ) और 31(1) को उल्लघंन है और सरकार पेंशन के अधिकार में प्रशासनिक आदेश के द्वारा कोई कटौती नही कर सकती और न उसे समाप्त कर सकती है।
पेंशन के अधिकार का विवाद के आर इररी बनाम स्टेट आफ पंजाब (ए.आइ.आर-1967- पंजाब-279) में पंजाब एण्ड हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष प्रश्नगत हुआ। उच्च न्यायालय ने सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा पारित दोनों पूर्व निर्णयों को आधार बनाकर प्रतिपादित किया कि पेंशन का अधिकार किसी कर्मचारी का महत्वपूर्ण अधिकार है। इस अधिकार में अनुशासनात्मक कार्यवाही के तहत यदि किसी प्रकार की कटौती की जानी है तो सम्बन्धित कर्मचारी को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का समुचित अवसर प्रदान किया जाना चाहिये। इस प्रकार के अवसर दिये बिना और इन अवसरों पर कर्मचारी द्वारा प्रस्तुत तथ्यों के गुणदोष पर विचार किये बिना पंेशन में कटौती का दण्ड अधिरोपित करने का कोई अधिकार सरकार या सेवायोजक को प्राप्त नही है। 
स्टेट आॅफ वेस्ट बंगाल बनाम हरेश सी. बनेर्जी (2006-7-एस.सी.सी-651) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि 44वें संविधान संशोधन अधिनियम 1978 के द्वारा सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार न माने जाने के बावजूद अनुच्छेद 300 ए के तहत पंेशन का अधिकार संवैधानिक अधिकार है और उसे सम्पत्ति के अधिकार के रूप में संवैधानिक मान्यता प्राप्त है। प्रशासनिक निर्देश की प्रक्रति विधिक नही होती इसलिये वे विधि की परिधि में नही आते। तदनुसार किसी कर्मचारी को प्रशासनिक निर्देशो के तहत पेंशन एवम ग्रेच्यूटी के अधिकार से वंचित नही किया जा सकता।

Monday, 22 December 2014

मानवाधिकारो के लिये बदलना होगा पुलिस का रवैया

पिछले दिनों इण्डियन काउन्सिल आॅफ ह्ययूमैन राइट्स की एक कार्यशाला को सम्बोधित करते हुये उत्तराचंल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री राजेश टंडन ने स्वीकार किया कि एन.डी.पी.एस. एक्ट के तहत पंजीकृत लगभग सभी मुकदमो में बरामदगी फर्जी होती है। स्थानीय पुलिस इस अधिनियम का जानबूझ कर दुरूपयोग करती है और उसने आम लोगो को उत्पीडित करने का इसे माध्यम बना लिया है। उन्होने अपने सम्बोधन में अपने अनुभवो को साझा करते हुये बताया कि मेरी पीठ के समक्ष जर्मनी की एक महिला के कब्जे से मादक पदार्थ की बरामदगी का मामला सामने आया जिस पर विचार करते हुये मैने पाया कि गिरफ्तार महिला को हिन्दी नही आती थी और उसे गिरफ्तार करने वाले पुलिस कर्मियों का अंग्रेजी भाषा से कोई वास्ता नही था परन्तु बरामदगी मेमो में लिखा था कि पुलिस कर्मियों ने महिला को बताया था कि उसे अपनी तलासी किसी मजिस्ट्रेेट या राजपत्रित अधिकारी के समक्ष कराने का अधिकार प्राप्त है परन्तु महिला ने किसी मजिस्ट्रेेट या राजपत्रित अधिकारी के समक्ष तलाशी के लिये जाने से इनकार कर दिया और कहा कि आप पर मुझे विश्वास है और आप ही मेरी तलाशी ले लीजिये। माननीय न्यायमूर्ति के अनुसार उन्हे यह पूरी प्रक्रिया फर्जी प्रतीत हुई और उन्होने एन.डी.पी.एस एक्ट की धारा 50 का अनुपालन न होने के कारण विदेशी महिला को दोषमुक्त घोषित कर दिया और बाद में उनके निर्णय की पुष्टि सर्वोच्च न्यायालय ने भी की थी।
मेरा अपना अनुभव भी बताता है कि स्वतन्त्र भारत में पुलिस बल संघटित अपराधियों का एक सरकारी गिरोह बन गया है, जो  राज्य की शक्तियों का प्रयोग प्रायः आम लोगो के मानवाधिकारो का हनन करने, उन्हे उत्पीडित करके अवैध कमाई करने के लिये करती है। किसी को भी फर्जी मुकदमा बनाकर वर्षो के लिये जेल में निरू़द्ध रहने के लिये अभिशप्त बना देने और फर्जी मुडभेड दिखाकर किसी की भी हत्या करने में इन्हे व्यवसायिक विशेषज्ञता हासिल है। आजादी के बाद सभी राजनैतिक दलों ने अलग अलग अवसरों पर पुलिसिया उत्पीडन और उसके द्वारा की गयी ज्यादातियों का विरोध करने के लिये उसकी तुलना विदेशी शासन के जलिया वाला बाग काण्ड से की है परन्तु सत्तारूढ रहने के दौरान किसी ने भी पुलिस बल को पब्लिक  ओरियेन्टेड सेवा प्रदाता संस्थान बनाने के लिये कोई पहल नही की, उस पर प्रभावी नियन्त्रण के लिये कोई तन्त्र विकसित नही किया बल्कि पुलिस कर्मियों को अपनी तत्कालिक राजनैतिक जरूरतों के लिहाज से आम लोगो के मानवाधिकारों के हनन की खुली छूट दी है। 
एन.डी.पी.एस. एक्ट के तहत सभी बरामदगी मेमो में लिखा रहता है कि हम पुलिस कर्मी गश्त पर जा रहे थे, सामने की ओर से एक व्यक्ति आता हुआ दिखायी दिया जो हम पुलिस वालो को अचानक देखकर ठिठका और पीछे मुडकर तेज कदमो से चलने लगा। शक हुआ उसे रोका टोका गया नही रूका। एकबारगी दौडाकर उसे पकड लिया । उससे भागने का कारण पूॅछा तो उसने बताया कि उसके पास चरस है। चरस होने की जानकारी प्राप्त होते ही उसे बताया गया कि उसे अपनी तलाशी किसी मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी के समक्ष कराने का अधिकार प्राप्त है परन्तु उसने तलाशी के लिये कहीं भी जाने से इनकार कर दिया और कहा कि हमें आप सब पर विश्वास है आप ही मेरी तलाशी ले लीजिये। इसी बीच उसने अपने पहने पैन्ट की दाहिनी जेब से एक पुडिया निकाल कर दी और कहा कि इसी में चरस है। प्रत्येक फर्द पर यही भाषा लिखी होती है और कभी कोई व्यक्ति पुलिस वालो की गिरफ्त में आने के पहले भागने के दौरान अपने जेब में रखी चरस को फेकता नही है और पुलिस वालो के आने का इन्तजार करता है। फर्द की भाषा से ही स्पष्ट हो जाता है कि पूरी प्रक्रिया एकदम फर्जी है और पुलिस अपने तरीके से फर्द लिखकर किसी को भी गिरफ्तार करके महीनों के लिये जेल भेज देती है।
सर्वोच्च न्यायालय ने फर्जी मामले बनाकर लोगो को जेल भेज देने की पुलिसिया कार्यवाही की आलोचना करते हुये कई बार कहा है कि फर्जी मामलो में जेल जाने वाले  लोग वर्षो जेल में रहने के बाद जब रिहा होते है तो कोई उनका वह समय वापस नही दिला सकता जो उन्होने निर्दोष होने के बावजूद जेल में बिताया है। कई  बार अपने आपको निर्दोष साबित कराने के लिये उन्हे सर्वोच्च न्यायालय तक लम्बा कानूनी युद्ध लडना पडता है और उसके व्यय को वहन करने के लिये उन्हे कर्ज, शर्म और उत्पीडन का शिकार होना पडता है। परन्तु जिला प्रशासन या राज्य सरकार के स्तर पर इसकी कोई चिन्ता नही करता। कानपुर के रामा डेन्टल कालेज के एक विद्यार्थी को पुलिस ने उसके पास से चरस बरामद करके जेल भेज दिया। मानवाधिकार आयोग ने इस घटना की जाॅच कराई तो पूरी प्रक्रिया फर्जी पाई गयी। मानवाधिकार आयोग ने सम्बन्धित थानाध्यक्ष के विरूद्ध कार्यवाही की अनुशंसा की परन्तु उनके विरूद्ध कोई कार्यवाही नही हुयी। बाद में न्यायालय ने भी पूरे मामले को फर्जी पाया और विद्यार्थी को दोषमुक्त घोषित कर दिया परन्तु उसका पूरा कैरियर बरबाद हो गया और वह डाक्टर नही बन सका।
वास्तव में इस प्रकार की स्थितियों में निर्दोष नागरिकोे के उत्पीडन के लिये खुद व्यवस्था दोषी है। राज्य का संवैधानिक दायित्व है कि वे अपने नागरिको के मान समान और उसकी गरिमा की रक्षा करे और किसी भी दशा में निर्दोष को उत्पीडित होने से बचाये। राज्य सरकारो को अपने स्तर पर प्रक्रियागत व्यवस्था स्थापित करके सुनिश्चित कराना चाहिये कि किसी भी दशा में किसी भी नागरिक को स्थानीय पुलिस कर्मी फर्जी मामलों में फॅसाने का दुस्साहस न कर सकें और मामलों को विचारण के लिये न्यायालय के समक्ष प्रेषित करने के पूर्व उनकी सधन उच्चस्तरीय समीक्षा की जाये और केवल उन्ही मामलों में आरोप पत्र प्रेषित किये जाये जिनमें सजा के लिये समुचित विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध हो। औपचारिकतावश आरोप पत्र प्रेषित करने की प्रक्रिया में आमूलचूल परिवर्तन किये जायें। विवेचना पूरी हो जाने के बाद स्वतन्त्र मस्तिष्क का प्रयोग करके संकलित साक्ष्य की समीक्षा की जाये और यदि उनमें कोई कमी पायी जाये तो बेहिचक उन्हे दूर किया जाये। आवश्यकता प्रतीत हो तो नये सिरे से पुनः साक्ष्य संकलित की जाये परन्तु किसी भी दशा में अपर्याप्त साक्ष्य के साथ आरोप पत्र न्यायालय के समक्ष प्रेषित नही किये जाने चाहिये। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुझाई गई इस उद्देश्यपरक प्रक्रिया से केवल उन्ही लोगो के विरूद्ध आरोप पत्र प्रेषित किये जा सकेगे जिनके विरूद्ध समुचित विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध होगी और उसके कारण अधिकांश अपराधो में अभियोजन को अभियुक्तो के विरूद्ध अधिरोपित आरोप  सिद्ध करने में सहजता होगी।
विदेशी शासन काल के दौरान वर्ष 1861 में बनाये गये पुलिस अधिनियम का उद्देश्य आतंक का राज्य कायम करके हम भारतीयो को उत्पीडित करके मान मर्यादा को धूलधुसरित करने का था। सोचा गया था कि आजाद भारत में इस अधिनियम को प्रभावहीन कर दिया जायेगा परन्तु अपने राज नेताओं ने इसमें कोई परिवर्तन नही किया और उसी कारण पुलिस का सोच व्यवहार एवं आचरण आज भी अंग्रेजो के शासनकाल की तरह आम नागरिकों को आतंकित रखने का है। स्वतन्त्र भारत में उनकी मानसिकता को बदलने का कोई  प्रयास नही किया गया। पुलिसिया व्यवस्था में सुधार के लिये केन्द्र सरकार और अनेक राज्य सरकारांे ने कई आयोगों का गठन किया है, परन्तु सभी आयोगों की रिपोर्ट सरकारी फाइलों में कैद है। पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने भी उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व डी.जी.पी. प्रकाश सिंह की याचिका पर पुलिसिया व्यवस्था में सुधार के लिये व्यापक दिशा निर्देश जारी किये है परन्तु  किसी राज्य सरकार ने इस दिशा निर्देशो के अनुरूप अपने पुलिस बल में सुधार के लिये कोई प्रयास नही किया है।  
किसी भी मामले में फर्जी गवाह खोजना और फिर उसी आधार पर अपराध के खुलासे की वाह वाही लूटना स्थानीय पुलिस अधिकारियों का प्रिय शगल है प्रेमचन्द्र बनाम यूनियन आॅफ इण्डिया (ए.आई.आर.-1981-पेज 613) की सुनवाई के समय एक व्यक्ति द्वारा बतौर अभियोजन साक्षी तीन हजार मामलों में गवाही देने का तथ्य प्रकाश में आने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रकार के पेशेवर साक्षियों की पूरी न्यायिक व्यवस्था के लिये प्रदूषण बताया था। सभी जानते है कि इस प्रकार का पुलिसिया आचरण मानवाधिकारो के लिये घातक है इस सबको देखकर लगता है कि आम लोगों के मानवाधिकारो की रक्षा और देश में सुशासन बनाये रखने के लिये कानून व्यवस्था को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में शामिल करना आवश्यक हो गया है।  

Sunday, 17 August 2014

न्यायिक नियुक्ति आयोग देर आये दुरस्त आये ................

उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों के चयन की अपारदर्शी कोलेजियम व्यवस्था को समाप्त करके केन्द्र सरकार ने संविधान की सर्वोच्चता के सुस्थापित सिद्धान्त को मान्यता दी है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश श्री आर.एम. लोढा सहित न्याय क्षेत्र के अधिकांश दिग्गज कोलेजियम व्यवस्था का मोह त्यागने को तैयार नही थे, परन्तु संसद ने जजो की नियुक्ति की कोलेजियम व्यवस्था बदलने वाले 99वें संविधान संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी है। लोक सभा में यह बिल शून्य के मुकाबले 367 मतों से मंजूर किया गया है। 
 मुख्य न्यायाधीश श्री आर.एम. लोढा ने कोलेजियम व्यवस्था की वकालत करते हुये कहा था कि न्यायपालिका को बदनाम करते हुये भ्रमित करने वाला अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने न्या
याधीशों के चयन की मौजूदा कोलेजियम व्यवस्था को सही भी ठहराया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि कोलिजियम गलत है तो हम भी गलत है।
कोलिजियम की व्यवस्था का संविधान में कोई प्रावधान नही है। इस व्यवस्था को खुद सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णयों के द्वारा स्थापित किया है। वास्तव मे यह व्यवस्था संविधान के प्रतिकूल है। संविधान के अनुच्छेद 124(2) एवं अनुच्छेद 217(1) के तहत सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के जजो को भारत के मुख्य न्यायाधीश के सलाह के बाद महामहिम राष्ट्रपति नियुक्ति करते है। संविधान के अनुसार सरकार मुख्य न्यायाधीश की सलाह मानने के लिए बाध्य नही है। वर्ष 1993 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित एक निर्णय के बाद कोलेजियम सिस्टम की शुरूआत हुई। इसके तहत वरिष्ठ न्यायाधीशों का समूह सर्वोच्च न्यायालय और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति करने लगा। इस निर्णय के करीब पाँच साल बाद सर्वोच्च न्यायालय की 9 सदस्यीय संवेधानिक पीठ ने कार्यपालिका से सलाह के बाद जजों की नियुक्ति की सिफारिश की। जिसमें मुख्य न्यायाधीश की सलाह को निर्णायक माना गया। सरकार कोलेजियम द्वारा सुझाये गये नामों मे से ही नियुक्ति के लिए बाध्य होती थी। यदि सरकार किसी नाम पर सहमत नही है तो वह विचार के लिए कोलेजियम के पास उसे सिर्फ एक बार वापस भेज सकती थी। यदि कोलेजियम दोबारा वही नाम भेजता, तो उसकी अनुशंशा मानना सरकार की बाध्यता थी। यह पूरी प्रक्रिया बन्द कमरे में वरिष्ठ न्यायाधीशों के बीच बैठकर पूरी की जाती है और उसके बारे में आम लोगों के लिए कोई जानकारी प्राप्त कर पाना लगभग असम्भव है।
कोलेजियम व्यवस्था के लागू होने के बाद भारत दुनिया में इकलौता ऐसा देश बन गया था, जहाँ जजों की नियुक्ति स्वयं जज करते है। गोपनीयता के नाम पर पारदर्शिता की उपेक्षा की जाती है। जिसके कारण जजो की नियुक्ति में पक्षपात और भाई भतीजा वाद की शिकायतें आम होने लगी। जजों की गुणवत्ता में भी कमी आने की शिकायतें मिली है। 
कोलेजियम व्यवस्था के शुरूआती दौर में कहा जाता था कि सर्वोच्च न्यायालय और हाई कोर्ट के जजों को न्यायिक प्रक्रिया की जानकारी रखने वालो के बारे में अन्य किसी की तुलना में ज्यादा अच्छी जानकारी होती है। लिहाजा नियुक्ति में उनकी राय को वरीयता दी जानी चाहियें। इस व्यवस्था के समर्थकों की तरफ से तर्क दिया जाता था इससे न्यायपालिका को राजनीतिक दखलन्दाजी से मुक्त रखा जा सकेगा। इस प्रकार के तर्को से संदेश दिया गया कि कोलेजियम व्यवस्था लागू होने के पहले हमारी न्यायपालिका की नियुक्तियों में राजनीतिक हस्तक्षेप किया जाता था। जबकि वस्तुस्थिति इसके प्रतिकूल है। कोलेजियम व्यवस्था के पहले नियुक्ति किये गये सर्वोच्च न्यायालय और हाई कोर्ट के जजों ने न्याय के उच्च मानदण्डों की रक्षा की थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश श्री जगमोहन लाल सिन्हा ने अपने ऐतिहासिक निर्णय के द्वारा 12 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी के लोक सभा चुनाव को रद्द करते हुये उन्हें अगले 6 वर्षों तक किसी भी संवैधानिक पद के लिए अयोग्य घोषित किया था। बाद में इसी मामले में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री वी.आर. कृष्णा अय्यर ने श्रीमती इन्दिरा गाँधी को संसद में मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया था। न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने अपनी पुस्तक ‘‘आफ द बेंच’’ में उस समय की कुछ घटनाओं को स्मरण करते हुये उल्लेख किया है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट में निर्णय पारित होने के कुछ ही मिनटों बाद तत्कालीन विधि मन्त्री श्री एच.आर. गोखले ने उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की थी। न्यायमूर्ति अय्यर ने स्पष्ट रूप से उनसे मिलने से इन्कार कर दिया था। इसलिए यह कहना एकदम गलत है कि कोलेजियम व्यवस्था के पहले के न्यायाधीशों की गुणवत्ता के साथ समझौते किये जाते थे। सत्यता तो यह है कि कोलेजियम व्यवस्था के द्वारा नियुक्त कई न्यायाधीशों की निष्ठा एवं ईमानदारी पर प्रश्नचिन्ह उपस्थिति हुये है और इन्हीं सब कारणों से कोलेजियम व्यवस्था में बदलाव की जरूरत महसूस हुई है।
कोलेजियम व्यवस्था की खामियाँ उजागर हो चुकी है और उसके स्थान पर केन्द्र सरकार द्वारा न्यायिक नियुक्ति आयोग की स्थापना की पहल स्वागत योग्य है, परन्तु साथ साथ यह भी ध्यान रखा जाना चाहिये कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामलें में सरकार की भूमिका ज्यादा प्रभावी और निर्णायक न होने पाये। यदि ऐसा कुछ होता है तो एक कमी से दूसरी कमी की ओर बढने वाली बात होगी। यह सच है कि ऐसी किसी व्यवस्था का निर्माण करना कठिन है। जिसमें किसी प्रकार की कोई कमी न हो।
हम सब जानते है कि जनपद न्यायालयों से सर्वोच्च न्यायालय तक सरकार का पक्ष प्रस्तुत करने के लिए लोक अभियोजक, स्टैण्डिंग काउन्सिल, एडवोकेट जनरल, सालिसिटर जनरल आदि की निुयक्ति सरकार द्वारा की जाती है और इन नियुक्तियों में सदा सर्वदा मेरिट की अनदेखी होती है। जनपद न्यायालयों में विभिन्न दलों की राज्य सरकारें अपने दल के कार्यकर्ताओं को उपकृत करने के लिए नियुक्तियाँ करती है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमन्त्री रहने के दौरान सुश्री मायावती ने सम्पूर्ण प्रदेश में अपनी पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा नियुक्त किये गये शासकीय अधिवक्ताओं को किसी युक्तियुक्त कारण के बिना हटा दिया और अपने दल के कार्यकर्ताओं को नियुक्त कर दिया। जबकि नियुक्ति पायें अधिकांश लोगों ने अपने वकालती जीवन के दौरान भारतीय दण्ड संहिता की धारा 323, 504, 506 जैसे अपराधों के विचारण का सामना नही किया था और ऐसे लोगों को हत्या, बालात्कार, डकैती जैसे गम्भीर अपराधों के संचालन का अधिकार दे दिया गया। हलाँकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बसपा सरकार द्वारा की गई सभी नियुक्तियों को रद्द कर दिया है और सर्वोच्च न्यायालय ने भी उच्च न्यायालय के फैसले पर मोहर लगा दी है, परन्तु अखिलेश सरकार भी शासकीय अधिवक्ताओं की नियुक्ति के मामले में बसपा सरकार के नक्शे कदम पर चलने में कोई शर्म महसूस नही कर रही है और वही सब करना चाहती है जो निर्लज्जतापूर्वक बसपा सरकार ने किया था। 
शासकीय अधिवक्ताओं की नियुक्ति में सभी स्तरों पर मेरिट की अन्देखी की घटनाओं को देखकर आशंका होती है कि जजों की नियुक्ति में भी सरकार की प्रभावी भूमिका हो जाने के बाद मेरिट के साथ समझौतों को कहीं वरीयता न दी जाने लगे। सरकार के मन्त्रियों से निष्पक्ष, न्यायपूर्ण और पारदर्शी निर्णय की अपेक्षा नही की जा सकती। सम्पूर्ण देश में प्रभावी पदों पर छोटे मन के लोगों की तैनाती आज आम बात हो गयी है। इसलिए कई प्रकार की आशंकाओं को बल मिलता है। नियुक्ति व्यवस्था बदलने से इस प्रकार की आशंकाओं का समाधान नही होगा। नियुक्ति की अपारदर्शी प्रक्रिया के साथ साथ न्यायाधीशों के आचरण पर भी सवाल उठने लगे है। इसलिए जब तक न्यायाधीशों के लिए न्यायिक मानदण्ड और जवाबदेही तय नही होगी तब तक न्यायपालिका के दामन को दागदार करने वाले लोग उसकी प्रतिष्ठा और गरिमा को ठेस पहुँचाते ही रहेंगे। अभी ऐसा कोई तन्त्र विकसित नही हो सका है जो न्यायाधीशों के आचरण मे खोट पाये जाने पर उनके विरूद्ध कार्यवाही सुनिश्चित कराता हो। सर्वोच्च न्यायालय और हाई कोर्ट के जज को हटाना तो दूर उसे अवकाश पर भेजने और उसके विरूद्ध अनुशाशनात्मक कार्यवाही भी लगभग असम्भव है। जस्टिस दिनकरन का मामला सबके सामने है जिन्होंने आरोंपों की जाँच होने तक अवकाश पर जाने की सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की सलाह मानने से इन्कार कर दिया था। 
प्रस्तावित न्यायिक नियुक्ति आयोग की संरचना अभी स्पष्ट नही है। आम सहमति बनाने की भी बात की जा रही है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रहे श्री मार्कण्डेय काटजू मानते है कि न्यायिक नियुक्ति आयोग मे सात सदस्य होने चाहियें जिसमें लोक सभा मे विपक्ष के नेता को शामिल किया जाना चाहियें और एक न्यायविद को राष्ट्रपति अपने विवेक से मनोनीत करें। चयन की प्रक्रिया को अमेरिकी सीनेट की तरह राष्ट्रीय स्तर पर टेलीविजन पर प्रसारित किया जाये। किसी भी दशा में न्यायिक स्वतन्त्रता के साथ कोई समझौता न हो और न्यायिक स्वतन्त्रा और न्यायिक जवाबदेही के बीच संतुलन बनाये रखा जाये। वास्तव में महत्वपूर्ण यह नही है कि नियुक्तियाँ न्यायपालिका करे या कार्यपालिका, महत्वपूर्ण यह है कि नियुक्तियाँ किस तरह से किन लोगों द्वारा की जाती है। अगर पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाये रखी जाये और राजनैतिक गुणा भाग को नियुक्ति प्रक्रिया से दूर रखा जाये तो निश्चिित रूप से गुणवत्ता के साथ समझौता नही हो सकेगा और उन स्थितियों को पुनः दोहराना सम्भव नही होगा, जिसमें कार्यपालिका न्यायिक नियुक्तियों में अहम भूमिका निभाती थी और अपने कार्यकर्ताओं को जज नियुक्त करके उपकृत करने में कोई संकोच नही करती थी।

Friday, 1 August 2014

जजो की नियुक्ति में पारदर्शिता जरूरी ..................

मद्रास उच्च न्यायालय में एक भ्रष्ट न्यायाधीश की नियुक्ति के खुलासे में सम्बन्धित क्षेत्रों में व्यक्त की जा रही चिन्ताये सरासर दिखावा है। कौन नही जानता कि हमारी न्यायिक व्यवस्था माँ गंगा की तरह प्रदूषित हो चुकी है। नियुक्ति से फैसलों तक सब कुछ मैनेज होता है। काफी पहले वर्ष 1995 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति श्री एस.एस. सोढी ने ‘‘द अदर साइड आफ जस्टिस’’ नामक पुस्तक में अपने साथ हुये अन्याय को उजागर करते हुये बताया था कि सर्वोच्च न्यायालय के कुछ न्यायमूर्तियों की व्यक्तिगत खुन्नस में उनकी योग्यता को दरकिनार करके उन्हें सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नही बनने दिया था। तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति श्री ए.एम. अहमदी ने अपने दो अन्य वरिष्ठ न्यायमूर्तियों की सलाह से जस्टिस सगीर अहमद, जस्टिस जी.टी. नानावटी, जस्टिस के वेंकटस्वामी और जस्टिस एस.एस. सोढी को सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त करने की अनुशंशा की थी परन्तु बाद मे जस्टिस सोढी को छोडकर अन्य तीनों न्यायमूर्तियों को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद की शपथ दिलाई गई। बताया जाता
है कि सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायमूर्ति श्री आर0एम0 सहाय के सम्बन्धी को लखनऊ उच्च न्यायालय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय स्थानान्तरित करने और फिर इस विषय पर उच्च स्तरीय दबाव के आगे नतमस्तक न होने के कारण जस्टिस एम.एस सोढी को न्यायमूर्तियों का कोपभाजन बनना पडा और उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश बनने से वंचित कर दिया गया।
सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए वर्तमान कोलेजियम व्यवस्था का कोई प्रावधान संविधान में नही है। संविधान में न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार राष्ट्रपति में निहित है। संविधान में राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय जैसी भी स्थिति हो के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करके सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति करने का प्रावधान है।
न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कोलजियम व्यवस्था का जन्म वर्ष 1993 में सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले से हुआ है। इसके बाद वर्ष 1998 में पुनः सर्वोच्च न्यायालय ने प्रेसीडेन्ट रिफरेन्स के मामले में अपना निर्णय सुनाकर कोलेजियम व्यवस्था को स्थायी बना दिया। इस निर्णय के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिपादित किया कि मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली कोलेजियम में मुख्य न्यायाधीश के अलावा चार वरिष्ठतम् जज होंगे और मुख्य न्यायाधीश अपने इन चार वरिष्ठ सहयोगियों से परामर्श करने के बाद ही नियुक्ति के लिए अपनी अनुशंशा सरकार को भेजेंगे और कोलेजियम की अनुशंशा सरकार पर बाध्यकर होगी।
कोलेजियम की इस व्यवस्था में सरकार की भूमिका लगभग समाप्त कर दी गई है। संवैधानिक प्रावधानों के तहत सरकार कोलेजियम से दुबारा विचार करने का आग्रह कर सकती है लेकिन अगर कोलेजियम अपनी अनुशंसाओं में कोई संशोधन नही करती और पूर्व अनुशंशा पर पुनः मोहर लगा देती है तो सरकार के लिए उसका पालन अपरिहार्य हो जाता है और वह उसे मानने से इन्कार नही कर सकती। वास्तव में यह पूरी व्यवस्था संविधान के प्रतिकूल है। संविधान में मुख्य न्यायाधीश को नियुक्ति के लिए अनुशंशा करने का अधिकार प्राप्त है। संविधान ने मुख्य न्यायमूर्ति को निर्णायक प्राधिकारी नही बनाया है। निर्णायक प्राधिकार राष्ट्रपति में निहित है। लेकिन वर्तमान व्यवस्था संविधान के इस स्पष्ट प्रावधान के प्रतिकूल है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने लिए न्यायाधीशो की नियुक्ति प्रक्रिया मे दावेदारों के गुण दोष का आकलन मुख्य न्यायमूर्ति और उनके अन्य वरिष्ठ सहयोगियो द्वारा अपने स्तर पर किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कोई पारदर्शिता नही है। बन्द कमरे में जो कुछ तय किया जाता है उसकी भनक किसी को नही लगती और यही इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा दोष है। अपने देश में किसी सार्वजनिक पद पर कोई नियुक्ति पारदर्शिता अपनाये बिना एकदम मनमाने तरीके से नही की जा सकती। ऐसी दशा में न्यायाधीशो की नियुक्ति के लिए बन्द कमरे की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करने का कोई विधिक औचित्य नही है और न संविधान इसकी अनुमति देता है।
आपातकाल के दौर को लोकतन्त्र का काला अध्याय माना जाये तो कोलेजियम व्यवस्था के अस्तित्व में आने के पूर्व सरकार न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए परम्परागत रूप से मुख्य न्यायाधीशें से परामर्श किया करती थी। यह भी सच है कि सरकार द्वारा नियुक्त किये गये न्यायाधीशों की निष्ठा ईमानदारी या योग्यता पर कभी प्रश्नचिन्ह नही लगे। कोलेजियम व्यवस्था के तहत नियुक्त न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार के आरोप आम होते जा रहे है जो अपनी न्यायपालिका और अन्ततः लोकतन्त्र के हित में नही है। 
आज समाज के प्रत्येक क्षेत्र मे भ्रष्टाचार अर्कमण्यता भाई, भतीजा वाद का बोल बाला है और उसके कारण व्यवस्था के प्रति लोगों का विश्वास घटता जा रहा है। इस प्रदूषित वातावरण मे भी आम लोगों को न्यायपालिका पर अटूट विश्वास है। लोग मानते है कि न्यायपालिका प्रदूषित हुई है परन्तु आज भी उसके अन्दर ईमानदार लोगों की संख्या ज्यादा है। इसलिए न्यायपालिका को साफ सुथरा रखना अन्य किसी व्यवस्था को साथ सुथरा रखने से ज्यादा जरूरी है। सन्तोष की बात है कि अपने देश में न्यायपालिका पर अँगुली नही उठाई जाती इसलिए न्यायपालिका को नियन्त्रित करने वालो का दायित्व बढ़ जाता है कि वे अपने बीच के प्रदूषण को चिन्हित करे और उन्हें बेहिचक बाहर का रास्ता दिखाये।
कोलेजियम सिस्टम को लेकर न्यायपालिका के अन्दर भी असन्तोष के स्वर उठने लगे है। न्यायमूर्ति चन्द्रमौलि प्रसाद और न्यायमूर्ति श्रीमती ज्ञान सुधा मिश्रा की सर्वोच्च न्यायालय मे नियुक्ति के समय शिकायतों का दौर चला था। हलाँकि दोनों को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद की शपथ दिलाई गई परन्तु असन्तोष की चिंगारी तो उठी ही थी। पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री के.जी. बालाकृष्णन ने कोलेजियम सिस्टम के दोषों को स्वीकार करते हुये कहा था कि जब तक सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों द्वारा प्रचलित इस व्यवस्था में परिवर्तन नही होता वे इसे मानने के लिए बाध्य है।
कालेजियम सिस्टम के तहत न्यायाधीशों के पद पर नियुक्ति के दावेदारों की निष्ठा कुशलता ईमानदारी आदि गुण दोषो की परख नही हो पाती। अलग अलग स्तरों से जानकारी एकत्र करने का कोई प्रावधान नही है। मुख्य न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश पूरी गोपनीयता बरतते हुये जानकारी एकत्र करते है। इस प्रक्रिया में पारदर्शिता न होने के कारण कमियों की सम्भावना बनी रहती है।
कोलेजियम सिस्टम दोषपूर्ण है और इसमें बदलाव समय की जरूरत है, परन्तु इसका यह अर्थ नही कि न्यायाधीशो की नियुक्ति का सम्पूर्ण क्षेत्राधिकार सरकारों को दे दिया जाये। आज के राजनैतिक वातावरण में किसी भी दल की सरकार से न्यायपूर्ण आचरण की उम्मीद की अपेक्षा करना खुद को धोखा देना है। हम सब जानते है कि राज्य सभा में सदस्यों को मनोनीत करने के अधिकार का सभी दलो की सरकारों ने दुरूपयोग किया है। कला साहित्य आदि क्षेत्र के लोगों को नही बल्कि पराजित राजनेताओं का पुर्नवास करने के लिए इस प्रावधान का उपयोग किया जाता है। ऐसी दशा में आवश्यक है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा की तर्ज पर न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन किया जाये। अखिल भारतीय परीक्षा उत्तीर्ण करके नियुक्त होने वाले न्यायाधीश हरेक दृष्टि से सक्षम एवं सुयोग्य होंगे। 
अधिकांश कामनवेल्थ देशों में जजो की नियुक्ति के लिए नेशनल ज्यूडिशियल एप्वाइन्मेन्ट कमीशन स्थापित किये गये है। इस प्रकार के कमीशन यू.के. साउथ अफ्रीका और कनाडा में अच्छी तरह काम कर रहे है। इस प्रकार के कमीशन स्वतन्त्र होते है और इसके द्वारा न्यायपालिका कार्यपालिका और समाज के अन्य सम्बन्धित वर्गो के दृष्टि कोण के आधार पर विचार किया जाना सहज हो जाता है। इस प्रक्रिया में नियुक्ति के लिए सार्वजनिक उद्घोषणा के द्वारा प्रार्थनापत्र आमन्त्रित किय जाते है इसलिए उसकी पूरी प्रक्रिया अपने आप पारदर्शी हो जाती है और मनमानी की सम्भावनायें नगण्य हो जाती है। अपने देश में विधि आयोग ने वर्ष 1987 में इस आशय की अनुशंशा की थी, जो आज तक स्वीकृत होने की प्रतीक्षा में है।
मनमोहन सरकार ने अपने कार्यकाल में राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के गठन के लिए लोक सभा में विधेयक पेश किया था जो लोक सभा का कार्यकाल समाप्त हो जाने के कारण समाप्त हो गया है। वर्तमान सरकार भी इसी आशय का संशोधन विधेयक संसद में प्रस्तुत करना चाहती है। वर्तमान सरकार के न्यायमन्त्री श्री रवि शंकर प्रसाद और वित्त मन्त्री श्री अरूण जेटली ने इस विषय पर वरिष्ठ विधि वेत्ताओं को साथ चर्चा की है।